सुन्दर विलास (सन्त सुन्दरदास जी - अद्वैत वेदान्त एवं ज्ञान-भक्ति काव्य सटीक)
Sundar Vilas of Sant Sundardas with Hindi Commentary
सन्त सुन्दरदास जी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१८४ ] ॥ सुन्दर विलास ॥ भूमि तौ विलीन गंध गंध हू विलीन आप, आप हू विलीन रस रस तेज खातु है । तेज रूप रूप वायु वायु हू सपर्श लीन, सो सपर्श व्योम शब्द तम हि बिलातु है ॥ इन्द्रिय दस रज मन देवता विलीन सत्व, तीनि गुन अह महतत्त गलि जातु है । महतत्त प्रकृति प्रकृति हू पुरुष लीन, सुन्दर पुरुष जाय ब्रह्म मैं समातु है ॥१७॥ आतमा अचल शुद्ध एक रस रहै सदा, देह बिवहारनि मैं देह ही सौ जानिये । जैसे शशि मंडल अभग नही भग होइ, कला आवै जाहि घटि बढ़ि सौ बखानिये ॥ जैसे द्रुम सुथिर नदी कै तट देखियत, नदो के प्रवाह माहि चलतौ सौ मानिये । तैसैं आतमा अतीत देह कौ प्रकाशक है, सुन्दर कहत यौ बिचारि भ्रम भानिये ॥१८॥ आतमा शरीर दोऊ एकमेक देखियत, जब लग अन्तहकरन मैं अज्ञान है । जसै अन्धियारी रैनि घर मैं अन्धेरौ होइ, आंखिनि कौ तेज ज्यौ कौ त्यौं ही विद्यमान है । जदपि अधेरै माहि नैन कौ न सूझै कछु, तदपि अधेरै तैं सौ अलिप्त बखानि है ।