भारतकोश
सुन्दर विलास (सन्त सुन्दरदास जी - अद्वैत वेदान्त एवं ज्ञान-भक्ति काव्य सटीक)

सुन्दर विलास (सन्त सुन्दरदास जी - अद्वैत वेदान्त एवं ज्ञान-भक्ति काव्य सटीक)

Sundar Vilas of Sant Sundardas with Hindi Commentary

सन्त सुन्दरदास जी द्वारा

DevanagariHindipublished284 पृष्ठ

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पृष्ठ 194

॥ सांख्य ज्ञान को अंग ॥ [ १८५ सुन्दर कहत तौ जौं एक मेक जांनत है, जौ लौ नहि प्रगट प्रकाश ज्ञान भानु है ॥१९॥ देह जड देवल मैं आतमा चैतन्य देव, याही कौ समुझि कर यासौ मन लाइये । देवल कौ बिनशत बार नहिं लागै कछु, देव तौ सदा अभग देवल मैं पाइये ॥ देब की शकति कर देवल की पूजा होइ, भोजन बिबिध भाति भोग हू लगाइये । देवल तें न्यारौ देव देवल मैं देखियत, सुन्दर बिराजमान और कहा जाइये ॥२०॥ प्रीति सो न पाती कोऊ प्रेम से न फूल और, चित्त सौ न चदन सनेहू सौ न सेहरा । हृदै सौ न आसन सहज सौ न सिंघासन, भाव सी न सौज और मुनि सौ न गेहरा ॥ शील सौ सनान नाहिं ध्यान सौ न धूप और, ज्ञान सौ न दीपक अज्ञान तम के हरा । मन सी न माला कोऊ सोऽहू सौ न जाप और, आतमा सौ देव नाहिं देह सौ न देहुरा ॥२१॥ (२०) देवल-देवालय, मन्दिर । (२१) देहुरा-देवालय, मन्दिर ।