सुन्दर विलास (सन्त सुन्दरदास जी - अद्वैत वेदान्त एवं ज्ञान-भक्ति काव्य सटीक)
Sundar Vilas of Sant Sundardas with Hindi Commentary
सन्त सुन्दरदास जी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१८६ ] ॥ सुन्दर विलास ॥ श्वासै श्वास राति दिन सोह सोह होइ जाप, याहि माला बार बार दिढकै धरतु है । देह परै इन्द्रिय परै अतहकरन परै, एक ही अखंड जाप ताप कौ हरतु है ॥ काठ की रुद्राक्ष की रु सूतहू की माला और, इनकै फिरायै कान कारिज सरतु है । सुन्दर कहत ताते आतमा चेतनि रूप, आपुकौ भजन सु तौ आपु ही करतु है ॥२२॥ क्षीर नीर मिलि दोऊ एकठे ई होइ रहे, नीर छाडि हस जैसे क्षीर कौ गहतु है । कचन मैं ओर धात मिलि कर बान पर्यौ, शुद्ध कर कचन सुनार ज्यौ लहतु है । पावक हू दारु मधि दारु ही सौ होइ रह्यौ, मथि कर काढै सोई दारु कौ दहतु है । तैसे ही सुन्दर मिल्यौ आत्मा अनात्मा जू, भिन्न भिन्न करिये सु साख्य यौ कहतु है ॥२३॥ अन्नमय कोश सु तौ पिंड है प्रगट यह, प्रानमय कोश पच वायु हू बखानिये । मनोमय कोश पच कर्म इन्द्रिय प्रसिद्ध, पच ज्ञान इन्द्रिय विज्ञान कोश जानिये ॥ जाग्रत सुपन विषै कहि चत्वार कोश, सुषुपति माहि कोश आनदमय मानिये ।