भारतकोश
सुन्दर विलास (सन्त सुन्दरदास जी - अद्वैत वेदान्त एवं ज्ञान-भक्ति काव्य सटीक)

सुन्दर विलास (सन्त सुन्दरदास जी - अद्वैत वेदान्त एवं ज्ञान-भक्ति काव्य सटीक)

Sundar Vilas of Sant Sundardas with Hindi Commentary

सन्त सुन्दरदास जी द्वारा

DevanagariHindipublished284 पृष्ठ

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पृष्ठ 196

॥ साख्य ज्ञान को अंग ॥ [ १८७ पच कोश आतमा कौ जीव नाम कहियत, सुन्दर शंकर भाष्य साख्य यह आनिये ॥२४॥ जाग्रत अवस्था जैसे सदन मै बैठियत, तहा कछु होइ ताहि भली भाति देखिये । स्वपन अवस्था जैसे ओवरे मै बैठे जाइ, रहै रहै उहा हू की वस्तु सब लेखिये ॥ सुषुपति भौंहरे मै बैठे तै न सूझि परै, महा अंध घोर तहा कछू हू न पेखिये । व्यौम अनुसूत घर आवरे भौंहरे मै, सुन्दर साक्षी स्वरूप तुरिया विसेखिये ॥२५॥ जाग्रत कै विषै जीव नैननि मैं देखियत, विविध व्योहार सब इन्द्रिन गहतु है । स्वपने हूं मांहि पुनि वैसे ही व्यौहार होत, नैननि तै आइ कर कठ मैं रहतु है ॥ सुषुपति हृदै मै बिलोन होइ जात जब, जाग्रत स्वपन की तौ सुधि न लहतु है । तीनि हू अवस्था कौ साक्षी जब जाने आपु, तुरिया स्वरूप यह सुन्दर कहतु है ।२६। (२५) अनुसूत-अनुस्यूत, प्रविष्ट । तुरिया-तुरीय, चतुर्थ ।