भारतकोश
सुन्दर विलास (सन्त सुन्दरदास जी - अद्वैत वेदान्त एवं ज्ञान-भक्ति काव्य सटीक)

सुन्दर विलास (सन्त सुन्दरदास जी - अद्वैत वेदान्त एवं ज्ञान-भक्ति काव्य सटीक)

Sundar Vilas of Sant Sundardas with Hindi Commentary

सन्त सुन्दरदास जी द्वारा

DevanagariHindipublished284 पृष्ठ

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१८८ ] ॥ सुन्दर विलास ॥ इन्द्वव छन्द जाग्रत रूप लिये सब तत्त्वनि, इन्द्रिय द्वार करै व्यवहारी। स्वप्न शरीर भ्रमै नव तत्त्व कौ, मानत है सुख दुख अपारौ ॥ लीन सबै गुन होत सुषूप्ति, जानै नही कछु घोर अंधारी। तीनौ कौ साक्षी रहे तुरियातत, सुन्दर सोई स्वरूप हमारौ ॥२७॥ भूमि तै सूक्षिम आप कौ जानहु, आप तैं सूक्षिम तेज कौ अंगा। तेज तैं सूक्ष्म वायु बहै नित, वायु तैं सूक्ष्म व्योम उतगा ॥ व्योम तैं सूक्षिम है गुन तीनि, तिन्हू तैं अह महत्तत्त्व प्रसंगा। ताहु तै सूक्षिम मूल प्रकृति जू, मूलतैं सुन्दर ब्रह्म अभंगा ॥२८॥ ब्रह्म निरंतर व्यापक अग्नि, अरूप अखंडित है सब माही। ईश्वर पावक रासि प्रचंड जू, सग उपाधि लिये वर ताही।