सुन्दर विलास (सन्त सुन्दरदास जी - अद्वैत वेदान्त एवं ज्ञान-भक्ति काव्य सटीक)

सुन्दर विलास (सन्त सुन्दरदास जी - अद्वैत वेदान्त एवं ज्ञान-भक्ति काव्य सटीक)
Sundar Vilas of Sant Sundardas with Hindi Commentary
सन्त सुन्दरदास जी द्वारा
DevanagariHindipublished284 पृष्ठ
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॥ सांख्य ज्ञान को अंग ॥ [ १८६ जीव अनंत मसाल चिराग सु, दीप पतंग अनेक दिखाँही । सुन्दर द्वैत उपाधि मिटै जब, ईश्वर जीव जुदै कछु नाही ॥२६॥ ज्यों नर पावक लौह तपावत, पावक लौह मिले सु दिखाही । चोट अनेक परै घन की सिर, लोह वधै कछु पावक नाही ॥ पावक लीन भयौ अपनै घर, शीतल लौह भयौ तब ताही । त्यौं यह आतम देह निरंतर, सुन्दर भिन्न रहै मिलि माही ॥३०॥ आतम चेतनि शुद्ध निरंतर, भिन्न रहै कहुं लिप्त न होई । है जड़ चेतनि अन्त करन जु, शुद्ध अशुद्ध लिये गुन दोई ॥ देह अशुद्ध मलीन महा जड़, हालि न चालि सकै पुनि वोई । सुन्दर तीनि विभाग किये बिन, भूलि परै भ्रमतै सब कोई ॥३१॥