भारतकोश
सुन्दर विलास (सन्त सुन्दरदास जी - अद्वैत वेदान्त एवं ज्ञान-भक्ति काव्य सटीक)

सुन्दर विलास (सन्त सुन्दरदास जी - अद्वैत वेदान्त एवं ज्ञान-भक्ति काव्य सटीक)

Sundar Vilas of Sant Sundardas with Hindi Commentary

सन्त सुन्दरदास जी द्वारा

DevanagariHindipublished284 पृष्ठ

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१६० ] ॥ सुन्दर विलास ॥ सवैया छंद ब्रह्म अरूप अरूपी पावक, व्यापक जुगल न दीसत रग । देह दारु तै प्रगट देखियत, अन्त'करन अग्नि द्वय अग ॥ तेज प्रकाश कल्पना तौ लग, जौ लग रहै उपाधि प्रसग । जह के तहा लोन पुनि होई, सुन्दर दोऊ सदा अभग ॥३२। देह शराव तेल पुनि मारुत, वाती अन्त करन विचार । प्रगट जोति यह चेतनि दीसै, जातै भयौ सकल उजियार ॥ व्यापक अग्नि मथन कर जोये, दीपक बहुत भाति बिस्तार । सुन्दर अद्भुत रचना तेरी, तूं ही एक अनेक प्रकार ॥३३॥ तिल मैं तेल दूध मैं घृत है, : दारु मांहि पावक पहिचानि । पुहुप मांहि ज्यौ प्रगट बासना, इक्षु मांहि रस कहत बखानि ॥ ।(३३) शराव-शकोरा, मिट्टी का दीया ।