भारतकोश
सुन्दर विलास (सन्त सुन्दरदास जी - अद्वैत वेदान्त एवं ज्ञान-भक्ति काव्य सटीक)

सुन्दर विलास (सन्त सुन्दरदास जी - अद्वैत वेदान्त एवं ज्ञान-भक्ति काव्य सटीक)

Sundar Vilas of Sant Sundardas with Hindi Commentary

सन्त सुन्दरदास जी द्वारा

DevanagariHindipublished284 पृष्ठ

पृष्ठ 200, कुल 284 में से

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पृष्ठ 200

॥ सांख्य ज्ञान को अंग ॥ [ १६१ पोसत मांहि अफीम निरंतर, बनस्पती मैं सहत प्रवानि । सुन्दर भिन्न मिल्यौ पुनि दीसत, देह मांहि यौं आतम जानि ॥३४॥ जाग्रत स्वप्न सुषूपति तीनों, अन्त करन अवस्था पावैं । प्रान चलै जाग्रत अरु सुप्ने, सुषुपति मैं पुनि अहर्निसि धावै ॥ प्रांन गये तै रहै न कोऊ, सकल देखता थाट बिलावै । सुन्दर आतम तत्त्व निरंतर, सौ तौ कतहू जाड न आवै ॥३५॥ पन्द्रह तत्व स्थूल कुम्भ मैं, सुक्षिम लिंग भर्यौ ज्यौ तोय । वहा जीव यहा आभा दीसै, ब्रह्म इन्दु प्रतिबिंबे दोय ॥ घट फूटै जल गयौ विलय व्है, अन्तहकरन कहै नहि कोय । तब प्रतिबिंब मिलै'शशि बिंबहि, सुन्दर जीव ब्रह्ममय होय ॥३६॥

सुन्दर विलास (सन्त सुन्दरदास जी - अद्वैत वेदान्त एवं ज्ञान-भक्ति काव्य सटीक) · पृष्ठ 200, कुल 284 में से · BharatKosha