सुन्दर विलास (सन्त सुन्दरदास जी - अद्वैत वेदान्त एवं ज्ञान-भक्ति काव्य सटीक)

सुन्दर विलास (सन्त सुन्दरदास जी - अद्वैत वेदान्त एवं ज्ञान-भक्ति काव्य सटीक)
Sundar Vilas of Sant Sundardas with Hindi Commentary
सन्त सुन्दरदास जी द्वारा
DevanagariHindipublished284 पृष्ठ
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॥ विचार को अंग ॥ [ १६५ एक ही बिचार कर सुख दुख सम जानै, एक ही विचार कर मल सब धोइ है। एक ही विचार कर ससार समुद्र तिरै, एक हो विचार कर पारगत होइ है ॥ एक ही बिचार कर बुद्धि नाना भाव तजै, एक ही बिचार कर दूसरी न कोइ है। एक ही बिचार कर सुन्दर सन्देह मिट, एक ही बिचार कर एक ब्रह्म जोड है ॥२०॥ इन्दव छंद रूप कौ नाश भयौ कछु देखिये, रूप तौ रूप ही माहिं समावै । रूप कै मद्धि अरूप अखंडित, सौ तौ कहू कछु जाइ न आवै ॥ बीच अज्ञान भयौ नव तत्त्व कौ, वेद पुरान सबै कोऊ गावै । सोऊ बिचार करै जब सुन्दर, सोधत ताहि 'कहू नहिं पावै ॥४॥ भूमि सु तौ नही गंध कौ छाडत, नीर सु तौ रसते नहि न्यारौ । तेज सु तौ मिलि रूप रह्यौ पुनि, वायु सपर्श सदा सु पियारी ॥