भारतकोश
सुन्दर विलास (सन्त सुन्दरदास जी - अद्वैत वेदान्त एवं ज्ञान-भक्ति काव्य सटीक)

सुन्दर विलास (सन्त सुन्दरदास जी - अद्वैत वेदान्त एवं ज्ञान-भक्ति काव्य सटीक)

Sundar Vilas of Sant Sundardas with Hindi Commentary

सन्त सुन्दरदास जी द्वारा

DevanagariHindipublished284 पृष्ठ

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पृष्ठ 205

१६६ ] ॥ सुन्दर विलास ॥ व्योम रु शब्द जुदे नहिं होत सु, ऐसे ही अंत करन बिचारौ । ये नव तत्त्व मिले इन तत्त्वनि, सुन्दर भिन्न स्वरूप हमारौ ॥५॥ क्षीण रु पुष्ट शरीर कौ धर्म जु, शीत हू ऊष्ण जरा मृतु ठानै । भूख तृषा गुन प्रान कौ व्यापत, शोक रु मोह उभै मन आनै ॥ बुद्धि बिचार करै निशि बासरि, चित्त चितै सु अह्र अभिमानै । सर्व कौ प्रेरक सर्व कौ साक्षी हु, सुन्दर आपुकौ न्यारौ ही जानै ॥६॥ एक ही कूप कै नीर तै सीचत, ईख अफीम ही अब अनारा । होत ऊहै जल स्वाद अनेकनि, मिष्ट कटुक्क खटा अरु खारा ॥ त्यों ही उपाधि सजोग तें आतम, दीसत आइ मिल्यौ सु बिकारा । काढि लियें जु विचार बिवस्वत, सुन्दर शुद्ध स्वरूप है न्यारा ॥७॥