सुन्दर विलास (सन्त सुन्दरदास जी - अद्वैत वेदान्त एवं ज्ञान-भक्ति काव्य सटीक)

सुन्दर विलास (सन्त सुन्दरदास जी - अद्वैत वेदान्त एवं ज्ञान-भक्ति काव्य सटीक)
Sundar Vilas of Sant Sundardas with Hindi Commentary
सन्त सुन्दरदास जी द्वारा
DevanagariHindipublished284 पृष्ठ
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॥ बिचार को अंग ॥ [ १६७ रूप परा कौ न जानि परै कछु, ऊठत है जिहिं मूल तें छानी । नाभि विषै मिलि सप्त स्वर हु, पुरुष सजौग पश्यति बखानी ।। नाद सजौग हृदै पुनि कठ जु, मद्धिमा याही बिचारतै जानीं । अक्षर भेद लिये मुख द्वार मु, बोलत सुन्दर बैखरी बानीं ॥८॥ ज्यों कोऊ रोग भयौ नर कै घट, वैद कहै यह वायु विकारा । कोऊ कहै ग्रह आइ लगे सब, पुत्ति किये कछु होइ ऊबारा ।। कोऊ कहै इहिं चूक परी कछु, देवनि दोष कियौ निरधारा । तैसे ही सुन्दर तत्रन के मत, भिन्न ही भिन्न कहै जु विचारा ॥६॥ जे विषया तम पूरि रहे, तिनकौ रजनी महिं बादर छायौ । कोऊ मुमुक्षु किये गुरुदेव, तिन्है भय युक्त जु शब्द सुनायौ ॥