सुन्दर विलास (सन्त सुन्दरदास जी - अद्वैत वेदान्त एवं ज्ञान-भक्ति काव्य सटीक)

सुन्दर विलास (सन्त सुन्दरदास जी - अद्वैत वेदान्त एवं ज्ञान-भक्ति काव्य सटीक)
Sundar Vilas of Sant Sundardas with Hindi Commentary
सन्त सुन्दरदास जी द्वारा
DevanagariHindipublished284 पृष्ठ
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१६८ ] ॥ सुन्दर विलास ॥ बादर दूरि भये उनके पुनि, तारनि सौ रजु सर्प दिखायौ । सुन्दर सूर प्रकाशत हो भ्रम, दूरि भयौ रजु कौ रजु पायौ ॥१०॥ कर्म शुभाशुभ की रजनी पुनि, अर्ध तमोमय अर्ध उजारी । भक्ति सु तौ यह है अरुणोदय, अन्त निशा दिन संधि बिचारी ॥ ज्ञान सु भानु सदोदित बासुरि, वेद पुरान कहैं जु पुकारी । सुन्दर तीन प्रभाव बखानत; यौ निहचै समुझै विधि सारी ॥११॥ मनहर छंद देह ई कौ आपु मानि देह ई सौ होइ रह्यौ, जडता अज्ञान तम शूद्र सोई जानिये । इंद्रिनि के व्यौपारनि अत्यन्त निपुन बुद्धि, तमो रज दुहू करि वैश्य हू प्रमानिये ॥ अ्रतहकरन माहि अहकार बुद्धि जाकै, रजोगुन बर्धमान छत्री पहिचानिये । सत्त्वगुन बुद्धि एक आतमा बिचार जाकै, सुन्दर कहत वह ब्राह्मन बखानिये । १२॥