सुन्दर विलास (सन्त सुन्दरदास जी - अद्वैत वेदान्त एवं ज्ञान-भक्ति काव्य सटीक)
Sundar Vilas of Sant Sundardas with Hindi Commentary
सन्त सुन्दरदास जी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें॥ विचार को अंग ॥ [ २६६ आतमा के विषै देह आइ करि नाश होइ, आतमा अखंड सदा एकई रहतु है । जैसे साप कचुको कौं लिय रहै कोऊ दिन, जीरन उतारि करि नूतन गहतु है । जैसे द्रुम हू के पत्र फूल फल आइ होत, तिनकै गये ते द्रुम और हू लहतु है । जैसे व्योम माहि अभ्र होइ कै बिलाइ जात, एसौ सौ बिचार कछु सुन्दर कहतु है ॥१३॥ खरी की डरी सौ अंक लिखिकै विचारियत, लिखिन लिखित वह डरी घसि जात है । लेखौ समुझ्यौ है जब समुझि परी है तब, जोई कछु सही भयौ सोई रहतु है । दारु ही सौं दारु मथि पावक प्रगट भयौ, वह दारु जारि पुनि पावक मैं समात है । तैसे ही सुन्दर बुद्धि ब्रह्म कौ बिचार कर, करत करत वह बुद्धि हू बिलात है ॥१४॥ आपु कौ समुझि देखि आपु ही सकल मांहि, आपु ही मैं सकल जगत देखियतु है । जैसे व्योम व्यापक अखंड परिपूरन है, बादर अनेक नाना रूप लेखियतु है ॥ (१३) अभ्र-बादल । द्रुम वृक्ष । कचुकी-कंचली ।