सुन्दर विलास (सन्त सुन्दरदास जी - अद्वैत वेदान्त एवं ज्ञान-भक्ति काव्य सटीक)
Sundar Vilas of Sant Sundardas with Hindi Commentary
सन्त सुन्दरदास जी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२०० ] ॥ सुन्दर विलास ॥ जैसै भूमि घट जल तरग पावक दीप, वायु मैं बघूरा जैसे विश्व रेखियतु है। ऐसै ही विचारत विचार हू विलीन होइ, सुन्दर ही सुन्दर रहत पेखियतु है ॥१५॥ देह कौ सजौंग पाइ जीव ऐसौ नाम भयौ, घट कै सजौग घटाकाश ज्यौं कहायौ है। ईश्वर हू सकल विराट मैं विराजमान, मठ कै सजौग मठाकाश नाम पायौ है ॥ महाकाश मांहि सब घट मठ देखियत, बाहिर भीतर एक गगन समायौ है। तैसे ही सुन्दर ब्रह्म ईश्वर अनेक जीव, त्रिविध उपाधि भेद ग्रन्थन मैं गायौ है ॥१६॥ देह दुख पावै किधौं इंद्री दुख पावै किधौं, प्रान दुख पावै जब लहै न अहार की। मन दुख पावै किधौ बुद्धि दुख पावै किधौं, चित्त दुख पावै किधौ दुख अहंकार की ॥ गुन दुख पावै किधौं भूत दुख पावै किधौं, प्रकृति दुख पावै कि पुरुष आधार की। सुन्दर पूछत कछु जानि न परत ताते, कौन दुख पावै गुरु कहौ या विचार की ॥१७॥