सुन्दर विलास (सन्त सुन्दरदास जी - अद्वैत वेदान्त एवं ज्ञान-भक्ति काव्य सटीक)
Sundar Vilas of Sant Sundardas with Hindi Commentary
सन्त सुन्दरदास जी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें॥ विचार को अंग ॥ [ २०१ देह कौ तौ दुख नाहि देह पच भूतनि की, इंद्रीनि कौ दुख नाहि दुख नाहि प्रान की । मन हू कौ दुख नाहि बुद्धि हू कौ दुख नाहि, चित्त हू कौ दुख नाहि, नाहि अभिमान कौ ॥ गुननि कौ दुख नाहिं सून हू कौ दुख नाहि, प्रकृति कौ दुख नाहि दुख न पुमान की । सुन्दर विचार ऐसा सिष्य सां कहत गुरु, दुख एक देखियत बोध के अज्ञान की ॥१८८। पृथ्वी भाजन अंग कनक कटक पुनि, जल हू तरंग दोऊ देखिके वखानिये । कारन कारज ये तौ प्रगट ही स्थूल रूप, ताहि नै नजर मांहि देखि करि आनिये ॥ पावक पवन व्योम ये तौ नहि देखियत, दीपक बधूरा अभ्र प्रत्यक्ष प्रमानिये । आतमा अरूप अति सूक्ष्म तें सूक्ष्म है, सुन्दर कारन तातैं देह मैं न जानिये ॥१९॥ जैन मत उहै जिनराज कौं न भूलि जाइ, दान तप शील साची भावना तैं तरिये । मन वच काय शुद्ध सबमी दयालु रहै, दोप बुद्धि दूर करि दया उर धरिये ॥