भारतकोश
सुन्दर विलास (सन्त सुन्दरदास जी - अद्वैत वेदान्त एवं ज्ञान-भक्ति काव्य सटीक)

सुन्दर विलास (सन्त सुन्दरदास जी - अद्वैत वेदान्त एवं ज्ञान-भक्ति काव्य सटीक)

Sundar Vilas of Sant Sundardas with Hindi Commentary

सन्त सुन्दरदास जी द्वारा

DevanagariHindipublished284 पृष्ठ

पृष्ठ 216, कुल 284 में से

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पृष्ठ 216

॥ निष्कलक को अंग ॥ [ २०७ कोऊ परदारा पर धन कौं तकत जाइ, कोऊ हिंसा करके उदर कौ भरतु है। सुन्दर कहत ब्रह्म माखी रूप एकरस, वाही मैं उपज कर वाही मै मरतु है।२॥ जैसे जल जंतु जल ही मैं उतपन्न होहि, जल ही मै विचरत जल के आधार है। जल ही मैं क्रीडत विविध विवहार ह.त, काम क्रोध लोभ मोह जन मैं सहार है॥ जल कौ न लागै कछु जीवन के राग द्वेष, उनही के क्रिया कर्म उन ही की [लार है। तैसे ही सुन्दर यह ब्रह्म मै जगत सब, ब्रह्म कौ न लागै कछु जगत विकार है ॥३॥ स्वदेज जरायुज अंडज उदभिज पुनि, चारि खानि तिनकै चौरासी -लख जत है। जलचर थलचर व्योमचर भिन्न भिन्न, देह पचभूतन की उपजि खपत है॥

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