भारतकोश
सुन्दर विलास (सन्त सुन्दरदास जी - अद्वैत वेदान्त एवं ज्ञान-भक्ति काव्य सटीक)

सुन्दर विलास (सन्त सुन्दरदास जी - अद्वैत वेदान्त एवं ज्ञान-भक्ति काव्य सटीक)

Sundar Vilas of Sant Sundardas with Hindi Commentary

सन्त सुन्दरदास जी द्वारा

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पृष्ठ 220

॥ आतम अनुभव को अंग ॥ [ २११ प्रश्नोत्तर एक कि दोइ न एक न दोइ, उही कि इही न उही न इही है । शून्य कि थूल न शून्य न थूल, जही कि तही न जही न तही है ॥ मूल कि डाल न मूल न डाल, वही की मही न वही न मही है । जीव कि ब्रह्म न जीव न ब्रह्म, तौ है कि नही कछु है न नही है ॥५॥ एक कहू तौ अनेक सौ दीसत, एक अनेक नही कछु ऐसाँ । आदि कहू तिहि अंतहू आवत, आदि न अंत न मध्य सु कैसाँ ॥ गोपि कहू तौ अगौपि कहा यह, गोपि अगोपि न ऊभौँ न वैसाँ । जोइ कहू सोइ है नही सुन्दर, है तौ सही पर जैसी की तैसौ ॥६॥ मनहर छंद एक कै कहै जौ कोऊ एक ही प्रकाशत है, दोइ कै कहे जौ कोऊ दूसरौ ऊ देखिये । (६) गोपि-गुप्त, गोपनीय ।