सुन्दर विलास (सन्त सुन्दरदास जी - अद्वैत वेदान्त एवं ज्ञान-भक्ति काव्य सटीक)

सुन्दर विलास (सन्त सुन्दरदास जी - अद्वैत वेदान्त एवं ज्ञान-भक्ति काव्य सटीक)
Sundar Vilas of Sant Sundardas with Hindi Commentary
सन्त सुन्दरदास जी द्वारा
DevanagariHindipublished284 पृष्ठ
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२१० ] ॥ सुन्दर विलास ॥ होत बिनोद जु तौ अभिअन्तरि, सो सुख आपु मैं आपु ही पइये । बाहिर कौ उमग्यौ पुनि आवत, कठ तै सुन्दर फेरि पठइये ॥ स्वाद निबेरै निबेर्यौ न जात, मनौ गुड गू गे हि ज्यौं नित खइये । क्या कहिये कहते न बनै कछु, ' जौ कहिये कहतैं ही लजइये ॥ ॥ व्योम सौ सौम्य अनत अखंडित, आदि न अंत सु मध्य कहा है । को परिमान करै परिपूरन, द्वैत अद्वैत कछू न जहा है ॥ कारन कारज भेद नही कछु, आपु मैं आपु ही आपु तहा है । सुन्दर दीसत सुन्दर माहि सु, सुन्दरता कहि कौन उहा है ॥४॥ (३) अभिअन्तर-भीतर । (४) व्योम-आकाश । सौम्य-व्यापक । कारज-कार्य ।