भारतकोश
सुन्दर विलास (सन्त सुन्दरदास जी - अद्वैत वेदान्त एवं ज्ञान-भक्ति काव्य सटीक)

सुन्दर विलास (सन्त सुन्दरदास जी - अद्वैत वेदान्त एवं ज्ञान-भक्ति काव्य सटीक)

Sundar Vilas of Sant Sundardas with Hindi Commentary

सन्त सुन्दरदास जी द्वारा

DevanagariHindipublished284 पृष्ठ

पृष्ठ 224, कुल 284 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 224

॥ आतम अनुभव को अग ॥ [ २१५ मूये तै मोक्ष मलेच्छ कहैं, तेऊ धोखै ही धोखै बखानत वैना । सुन्दर आतम कों अनुभै जोई, जीवत मोक्ष सदा सुख चैना ॥१४॥ जाग्रत तौ नहि मेरे विषै कछु, स्वप्न सु तौ नहि मेरे दिखै है । नाहि सुषूपति मेरे विषै पुनि, विश्व हु तेजस प्राज्ञ परै है ॥ मेरे विषै तुरिया नहि दीसत, याही तैं मेरो स्वरूप अखै है । दूर तैं दूर परै तैं परै अति, सुन्दर काउ न मोहि लखै है ॥१५॥ मनहर छन्द कोउ तौ कहत ब्रह्म नाभि के कवल मधि, कोउ तौ कहत ब्रह्म हृदै मैं प्रकास है । कोउ तौ कहत कठ नासिका कै अग्रभाग, कोउ तौ कहत ब्रह्म भृकुटी मैं वास है ॥ (१४) शिवसैना-शैव-सम्प्रदाय । मलेच्छ-मुस्लिम सम्प्रदाय ।