सुन्दर विलास (सन्त सुन्दरदास जी - अद्वैत वेदान्त एवं ज्ञान-भक्ति काव्य सटीक)
Sundar Vilas of Sant Sundardas with Hindi Commentary
सन्त सुन्दरदास जी द्वारा
पृष्ठ 225, कुल 284 में से
संदर्भ में पढ़ें२१६ [ ॥ सुन्दर विलास ॥ कोउ तौ कहत ब्रह्म दसवे द्वार के बीच, कोउ नौ कहत भौर गुफ़ा में निवास है । पिंड नै ब्रह्माण्ड तै निरंतर बिराजै ब्रह्म, सुन्दर अखंड जैसे व्यापक आकाश है ॥१६॥ पाव जिनि गह्यो सु तौ कहत है ऊखल सौ, पूछ जिनि गही तिन लाब सौ सुनायौ है । सूंडि जिन गही तिन दगली की बांह कह्यौ, दंत जिन गह्यौ तिन मूसर दिखायौ है । कान जिन गह्यो तिन सूप सो बनाइ कह्यौ, पीठ जिन गही तिन बिटोरा बतायो है । जैसो है सु तैसो ताहि सुन्दर मयाखी जाने, आंधरेनि हाथी देखि झगरा मचायौ है ॥१७॥ न्याय शास्त्र कहत है प्रगट ईश्वर वाद, मीमासक शास्त्र महि कर्मवाद कह्यौ है । वैशेषिक शास्त्र पुनि कालवादी है प्रसिद्ध, पातंजली शास्त्र महि योगवाद लह्यौ है । सांख्य शास्त्र माहि पुनि प्रकृति पुरुष वाद, वेदान्त शास्त्र तिनहि ब्रह्मवाद गह्यौ है । सुन्दर कहत षट् शास्त्र माहि भयौ वाद, जाकें अनुभव ज्ञान वाद मै न वह्यौ है ॥१८॥ (१६) पिंड-शरीर ।