सुन्दर विलास (सन्त सुन्दरदास जी - अद्वैत वेदान्त एवं ज्ञान-भक्ति काव्य सटीक)
Sundar Vilas of Sant Sundardas with Hindi Commentary
सन्त सुन्दरदास जी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें॥ आतम अनुभव को अंग ॥ [ २१७ 'प्रज्ञानमानन्द ब्रह्म' ऐसें ऋग्वेद कहत, 'अहं ब्रह्म अस्मि' इति यजुर्वेद यौ कहै । 'तत्वमसि' इति सामवेद यौं बखानत है, 'अयमात्मा ब्रह्म' वेद अथरवन लहै ॥ एक एक बचन मैं तीन पद है प्रसिद्ध, तिनकौ बिचार कर अर्थ तत्व कौ गहै । चारि वेद भिन्न भिन्न सब कौ सिद्धांत एक, सुन्दर समुझि कर चुपचाप व्है रहै ॥१६॥ इन्द्रिनि के भोग जब चाहै तब आइ रहै, नाशवत तातै तुच्छानन्द यौ सुनायी है । देवलोक इन्द्रलोक विधिलोक शिवलोक, बैकुण्ठ कै सुख लौ गलीतानंद गायी है ॥ अक्षय अखंड एकरस परिपूरन है, ताहि तै पूरनानंद अनुभै तै पायी है । याही कै अन्तरभूत आनंद जहां लौं और, सुन्दर समुद्र माहि सर्व जल आयी है ॥२०॥ एक तौ माया विलास जगत प्रपंच यह, चारि खानि भेद पाइ द्वैत भान तहाँ है ; दूसरौ विषै विलास इन्द्रिनि कें विषै पंच शब्द हू स्पर्श रूप रस गंध,