भारतकोश
सुन्दर विलास (सन्त सुन्दरदास जी - अद्वैत वेदान्त एवं ज्ञान-भक्ति काव्य सटीक)

सुन्दर विलास (सन्त सुन्दरदास जी - अद्वैत वेदान्त एवं ज्ञान-भक्ति काव्य सटीक)

Sundar Vilas of Sant Sundardas with Hindi Commentary

सन्त सुन्दरदास जी द्वारा

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२१८ ] ॥ सुन्दर विलास ॥ तीजौ वाचिक विलास सु तौ सब बेदौ माहि, बरनि कै जहा लग बचन ते कह्यौ है । चौथौ ब्रह्म कौ विलास तिहू कौ अभाव जहा, सुन्दर कहत वह अनुभै तै लह्यौ है ॥२१॥ जीवत ही देवलोक जीवत ही इन्द्रलोक, जावत ही जन तप सति लोक आयौ हे ! जीवत ही बिधि लोक जीवत ही शिव लोक, जीवत बैकुण्ड लोक जो अकुण्ठ गायौ है । जीवत ही मोक्षशिला जीवत ही भिस्त मांहि, जीवत ही निकट परम पद पायौ है । आत्मा कौ अनुभव जिनकौ जीवत भयौ, सुन्दर कहत तिन सशय मिटायौ है ॥२२। इच्छा ही न प्रकृति न महत्तत्त अहकार, त्रिगुन न व्योम आदि शब्दादि न कोइ है । श्रवणादि बचनादि देवता न मन आदि, सूक्षिम न स्थूल पुनि एक ही न दोइ है ॥ (२१) मायाविलास-माया का खेल या निर्माण । प्रपच-विस्तार । (२२) सति-सत्य । भिस्त-वहिस्त, स्वर्ग ।