सुन्दर विलास (सन्त सुन्दरदास जी - अद्वैत वेदान्त एवं ज्ञान-भक्ति काव्य सटीक)
Sundar Vilas of Sant Sundardas with Hindi Commentary
सन्त सुन्दरदास जी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें॥ आतम अनुभव को अग ॥ [ २१६ स्वेदज न अडज जरायुज न उदभिज, पशु ही न पखी ही न पुरुष ही न जोइ है । सुन्दर कहत ब्रह्म ज्यौं कौ त्यौ ही देखियत, न तौ कछु भयौ अब है न कछु होइ है ॥२३॥ क्षिति भ्रम जल भ्रम पावक पवन भ्रम, व्योम भ्रम तिनकौ शरीर भ्रम मानिये । इन्द्रिय दस तेऊ भ्रम अन्तहकरन भ्रम, तिनहू के देवता सु भ्रम तै बखानिये ॥ सत्व रज तम भ्रम पुनि अहकार भ्रम, महत्तत प्रकृति पुरुष भ्रम भानिये । जोई कछु कहिये सु सुन्दर सकल भ्रम, अनुभै किये तैं एक आतमा ही जानिये ॥२४॥ भूमि हू विलीन होइ आप हू विलीन होइ, तेज हू त्रिलोन होइ बायु जो वहतु है । ब्योम हू विलीन होइ त्रिगुन विलीन होइ, शब्द हू विलीन होइ अह जो कहतु है । (२३) त्रिगुण-सत्व, रज,तम । स्वेदज-ऊष्मा से पैदा होने वाले जीव, दीमक, जू आदि । अण्डज-अण्डे से पैदा होने वाले जीव, चिडिया, मोर, कबूतर आदि । जरायुज- जेर से लिपटे हुए पैदा होने वाले जीव, मनुष्य पशु आदि । उदभिज्ज-जमीन से निकलने वाले पेड़ पौधे । (२४) भ्रम-माया जन्य, असत्य ।