सुन्दर विलास (सन्त सुन्दरदास जी - अद्वैत वेदान्त एवं ज्ञान-भक्ति काव्य सटीक)
Sundar Vilas of Sant Sundardas with Hindi Commentary
सन्त सुन्दरदास जी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२२० ] ॥ सुन्दर विलास ॥ महत्तत्त लीन होइ प्रकृति बिलीन होइ, पुरुष बिलीन होइ देह जो गहतु है । सुन्दर सकल जो जो कहिये सु लीन होइ, आतमा के अनुभव आतमा रहतु है ॥२५॥ माया को अपेक्षा ब्रह्म रात्रि की अपेक्षा दिन, जड की अपेक्षा करि चेतनि बखानिये । अज्ञान अपेक्षा ज्ञान बंध की अपेक्षा मोक्ष, द्वैत की अपेक्षा सो तो अद्वैत प्रमानिये । दुख की अपेक्षा सुख पाप को अपेक्षा पुनि, झूठ की अपेक्षा ताहि सति कर मानिये । सुन्दर सकल यह बचन बिलास भ्रम, वचन ऊ अबचन रहित सोई जानिये ।२६॥ आतमा कहत गुरु शुद्ध निरबध नित्य, सत्य कर मानै सु तौ शब्द हू प्रभान है । जैसे ब्योम ब्यापक अखंड परिपूरन है, ब्योम उपमा तैं उपमान सो प्रमान है ॥ जाकी सत्ता पाइ सब इन्द्रिय चेतन होइ, याही अनुमान तैं अनुमान हू प्रमान है । अनुभव जानै तब सकल सदेह मिटै, सुन्दर कहत यह प्रत्यक्ष प्रमान है ॥२७॥ (२५) पुरुष-जीवात्मा । (२७) निरबध-बंधन रहित । सत्ता-आश्रय ।