सुन्दर विलास (सन्त सुन्दरदास जी - अद्वैत वेदान्त एवं ज्ञान-भक्ति काव्य सटीक)

सुन्दर विलास (सन्त सुन्दरदास जी - अद्वैत वेदान्त एवं ज्ञान-भक्ति काव्य सटीक)
Sundar Vilas of Sant Sundardas with Hindi Commentary
सन्त सुन्दरदास जी द्वारा
DevanagariHindipublished284 पृष्ठ
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२२२ ] ॥ सुन्दर विलास ॥ चकमक ठोके तै चमत्कार होत कछु, ऐसौ है श्रवन ज्ञान तबही लौ जानिये । कफमन लागै जब प्रगटै पावक ज्ञान, सिलगत जाइ वह मनन बखानिये ॥ वर्धमान भये काठ कर्मनि जरावत है, वह निदिध्यास ज्ञान ग्रंथनि मैं गानिये । सकल प्रपंच यह जारि कै समाइ जात, सुन्दर कहत वह अनुभै प्रमानिये ॥३०॥ भोजन की बात सुनि मन मैं मुदित होत, मुख मैं न परै जौ लौ मेलिये न ग्रास है । सकल सामग्रो आनि पाक कौ करन लाग्यौ, मनन करत कब जीमू यह आस है ॥ पाक जब भयौ तब भोजन करन बैठो, मुख मैं मेलत जाइ उहै निदिध्यास है । भोजन परन करि तृपत भयौ है जब, सुन्दर साक्षानकार अनुभै प्रकास है ॥३१॥ श्रवन करत जब सबसौ उदास होइ, चित्त एकागर आनि गुरु मुख सुनिये ।
(३०) कफमन-कपास, रूई ।