भारतकोश
सुन्दर विलास (सन्त सुन्दरदास जी - अद्वैत वेदान्त एवं ज्ञान-भक्ति काव्य सटीक)

सुन्दर विलास (सन्त सुन्दरदास जी - अद्वैत वेदान्त एवं ज्ञान-भक्ति काव्य सटीक)

Sundar Vilas of Sant Sundardas with Hindi Commentary

सन्त सुन्दरदास जी द्वारा

DevanagariHindipublished284 पृष्ठ

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पृष्ठ 232

॥ आतम अनुभव को अंग ॥ [ २२३ बैठि कै एकत ठौर अंतहकरन माहि, मनन करत फेरि उहै ज्ञान गुनिये ॥ ब्रह्म अपरोक्ष जानि कहत है अह ब्रह्म, सोह सोह होइ सदा निदिध्यास घुनिये । उहै अनुभव उहै कहिये साक्षातकार, सुन्दर पालै तैं गलि पानी होइ मुनिये ॥३२॥ जब ही जिज्ञास होइ चित एक ठौर आनि, मृग ज्यौ सुनत नाद श्रवन सो कहिये । जैसे स्वाति बूंद हू कौ चातक रटत पुनि, ऐसे ही मनन करै कब बूंद लहिये ॥ जैसे रात्रि हू चकोर चंद्रमा कौ धरै ध्यान, ऐसे जानि निदिध्यास दृढ करि ग्रहिये । सुन्दर साक्षातकार कीट जैसे होइ भृंग, उहै अनुभव उहै स्वस्वरूपर हिये ॥३३ ॥ काहू कौ पूछत रक धन कैसे पाइयत, कान दै कै सुनत श्रवन सोई जानिये । उन कह्यौ धन हम देख्यौ है फलानी ठौर, मनन करत भयौ कब घर आनिये ॥ (३२) एकागर-एकाग्र । (३३) जिज्ञास-जिज्ञासा ।