सुन्दर विलास (सन्त सुन्दरदास जी - अद्वैत वेदान्त एवं ज्ञान-भक्ति काव्य सटीक)

सुन्दर विलास (सन्त सुन्दरदास जी - अद्वैत वेदान्त एवं ज्ञान-भक्ति काव्य सटीक)
Sundar Vilas of Sant Sundardas with Hindi Commentary
सन्त सुन्दरदास जी द्वारा
DevanagariHindipublished284 पृष्ठ
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२२६ ] ॥ सुन्दर विलास ॥ बोलत चालत बैठत ऊठत, पीवत खातहु सूंघत श्वासै । ऊपरि तौ ब्यवहार करै सब, भीतर स्वप्न समान सौ भासै ॥ लै कर तीर पताल कौ साधत, मारत है पुनि फेरि अकासै । सुन्दर देह क्रिया सब देखत, कोऊ न पावत ज्ञानी को आशै ॥३॥ बैठै तौ बैठै चलै तौ चलै पुनि, पीछै तौ पीछै हि आगै तौ आगै । बोलैतौ बोलै न बोलैतौ मौनहि, सोवै तौ सोवै रु जागै तौ जागै ॥ खाइ तौ खाइ नही तौ नही जु, ग्रहै तौ ग्रहै अरु त्यागी तौ त्यागै । सुन्दर ज्ञानी की ऐसी दशा यह, जानै नही कछु राग विरागै ॥४॥ (३) आशै-आशय, भाव, अभिप्राय ।