सुन्दर विलास (सन्त सुन्दरदास जी - अद्वैत वेदान्त एवं ज्ञान-भक्ति काव्य सटीक)

सुन्दर विलास (सन्त सुन्दरदास जी - अद्वैत वेदान्त एवं ज्ञान-भक्ति काव्य सटीक)
Sundar Vilas of Sant Sundardas with Hindi Commentary
सन्त सुन्दरदास जी द्वारा
DevanagariHindipublished284 पृष्ठ
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॥ ज्ञानी को अंग ॥ [ २२५ अथ ज्ञानी को अंग ॥२७॥ इन्दव छंद जाकै हृदै महिं ज्ञान प्रकासत ताकौ सुभाव रहै नहिं छानौ । नैन मैं बैन मैं सैन मै जानिये, ऊठत बैठत है अलसानौ । ज्यौ कछु भक्ष किये उदगारत, कैसैं हुं राखि सकै न अघानौ । सुन्दरदास प्रसिद्धि दिखावत, धान कौ खेत पयार तैं जानौ ।:१॥ ज्ञान प्रकाश भयौ जिनकै उर, वे घट क्यूं हि छिपे न रहैगे । भोड्ल मांहि दुरै नहि दीपक, यद्यपि वे मुख मौन गहेगे । ज्यूं घनसार हि गोप छिपावत, तौहि सुगंधि सु तज्ञ लहैगे । सुन्दर और कहा कोऊ जानत, बूंठे को बात बटाऊ कहैगे ॥२ । (१) पयार-प्याल, चावल का डठल । (२) घनसार-कपूर । तज्ञ-तत्वज्ञ, समझने वाले । दुरै-छिपता है । बूंठेकी-यात्री की ।