भारतकोश
सुन्दर विलास (सन्त सुन्दरदास जी - अद्वैत वेदान्त एवं ज्ञान-भक्ति काव्य सटीक)

सुन्दर विलास (सन्त सुन्दरदास जी - अद्वैत वेदान्त एवं ज्ञान-भक्ति काव्य सटीक)

Sundar Vilas of Sant Sundardas with Hindi Commentary

सन्त सुन्दरदास जी द्वारा

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२३० ] ॥ सुन्दर विलास ॥ अंतहकरन जाकै तम गुन छाइ रह्यौ, जड़ता अज्ञान वाकै आलस भै त्रास है। रज गुन कौ प्रभाव अंतहकरन जाकै, विविध करम वाकै कामनां को वास है ॥ सत्त्व गुन अंतहकरन जाकै देखियत, क्रिया करि सुध वाकै भक्ति कौ निवास है। त्रिगुन अतीत साक्षी तुरीय स्वरूप जानि, सुन्दर कहत वाकै ज्ञान को प्रकाश है ॥१२॥ तमोगुनी बुद्धि सु तौ तवा कै समान जैसे, ताकै मध्य सूरज की रच हू न जोति है। रजोगुनी बुद्धि जैसे आरसी की औंधी ओर, ताकै मध्य सूरज कौ कछुक उद्योत है॥ सतोगुनी बुद्धि जैसे आरसी की सूधी ओर, ताकै मध्य प्रतिबिंब सूरज की पोत है। त्रिगुन अतीत जैसे प्रतिबिंब मिटि जात, सुन्दर कहत एक सूरज ई होत है ॥१३॥ (१२) तुरीय-चतुर्थ अवस्था । भै भय । (१३) उद्योत-प्रकाश । पोत-छाया ।