सुन्दर विलास (सन्त सुन्दरदास जी - अद्वैत वेदान्त एवं ज्ञान-भक्ति काव्य सटीक)

सुन्दर विलास (सन्त सुन्दरदास जी - अद्वैत वेदान्त एवं ज्ञान-भक्ति काव्य सटीक)
Sundar Vilas of Sant Sundardas with Hindi Commentary
सन्त सुन्दरदास जी द्वारा
DevanagariHindipublished284 पृष्ठ
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॥ ज्ञानी को अग ॥ [ २३१ सबसौँ उदास होइ काढ़ि मन भिन्न करै, ताकौ नाम कहियत परम बैराग है । अंतहकरन हूं की वासना निवृत्त होहि, ताकौ मुनि कहत हैं उहै बडौ त्याग है ॥ चित्त एक ईश्वर सौं नेकहू न न्यारौ होइ, उहै भक्ति कहियत उहै प्रेम माग है । आपु ब्रह्म जगत कौ एक करि जानै जब, सुन्दर कहत वह ज्ञान भ्रम भाग है ॥१४॥ भ्रम विध्वंस कोऊ नृप फूलनि की सेज पर सूतौ आइ, जब लग जाग्यौ तौ लौं अति सुख मान्यौ है । नीद जब आई तब वाही कौ सुपन भयौ, जाइ पर्यौ नरक कै कुंड मैं यों जान्यौ है ॥ अति दुख पावै पर निकस्यौ न क्यौ ही जाइ, जागि जब पर्यौ तब सुपन बखान्यौ है । इह झूठ वह झूठ जाग्रत सुपन दोऊ, सुन्दर कहत ज्ञानी सब भ्रम भान्यौ है ॥१५॥ (१४) माग-मार्ग । भ्रमभाग-भ्रान्ति रहित ।