सुन्दर विलास (सन्त सुन्दरदास जी - अद्वैत वेदान्त एवं ज्ञान-भक्ति काव्य सटीक)
Sundar Vilas of Sant Sundardas with Hindi Commentary
सन्त सुन्दरदास जी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२३२ ] ॥ सुन्दर विलास ॥ सुपनै मै राजा होइ सुपनै मैं रक होइ, सुपनै मैं सुख दुख सति करि जानै है । सुपनै मैं बुद्धिहीन मूढ समझै न कछु, सुपनै मैं पडित बहु ग्रथनि बखानै है ॥ सुपनै मैं कामी होइ इद्रनि कै बसि पर्यौ, सुपनै मैं जती होइ अहकार आनै है । सुपनै ते जाग्यौ जब समुझि परी है तब, सुन्दर कहत सब मिथ्या करि मानै है ॥१६॥ बिधि न निषेध कछु भेद न अभेद पुनि, क्रिया सौ कग्त दीसै यौ ही नित प्रति है । काहू कौ निकट राखै काहू कौ तौ दूरि भाखै, काहू सौ नेरै न दूरि ऐसी जाकी मति है ॥ राग ही न द्वेष कोऊ शोक न उछाह दोऊ, ऐमी विधि रहै कहु रति न विरति है । वाहिर व्यौहार ठानै मन मैं सुपन जानै, सुन्दर ज्ञानी की कछु अदभूत गति है ॥१७॥ (१६) जती-यति, साधु सन्यासी । (१७) विधि-विधान, आज्ञा । उछाह-उत्साह, उमग, खुशी । रति-आसक्ति । विरति-वैराग्य, अरुचि ।