सुन्दर विलास (सन्त सुन्दरदास जी - अद्वैत वेदान्त एवं ज्ञान-भक्ति काव्य सटीक)

सुन्दर विलास (सन्त सुन्दरदास जी - अद्वैत वेदान्त एवं ज्ञान-भक्ति काव्य सटीक)
Sundar Vilas of Sant Sundardas with Hindi Commentary
सन्त सुन्दरदास जी द्वारा
DevanagariHindipublished284 पृष्ठ
पृष्ठ 242, कुल 284 में से
संदर्भ में पढ़ेंपृष्ठ 242
॥ ज्ञानी को अंग ॥ [ २३३ कामी है न जती है न सूम है न सती है न,
- राजा है न रक है न तन है न मन है। सोवै है न जागै है न पीछे है न आगै है न, ग्रहै है न त्यागै है न घर है न वन है॥ थिर है न डोलै है न मौन है न बोलै है न, बधै है न खोलै है न स्वामी है न जन है। वैसौ कोऊ होइ जब वाकी गति जानै तब, सुन्दर कहत ज्ञानी शुद्ध ज्ञान-घन है ॥१८॥ सुनत श्रवन मुख बोलत बचन घ्रान, सूघन फूलनि रूप देखत दृगन है। त्वक् सपर्शन रस रसना ग्रसन कर, ग्रहत असन अरु चलत पगन है॥ करत गवन पुनि बैठत भवन सेज, सोवत रवन तन औढत नगन है। जु जु कछु बिवहार जानत सकल भ्रम, सुन्दर कहत ज्ञानी गगन-मगन है ॥१९॥ (१९) अशन-भोजन । गगनमगन-आकाशवत् शुद्ध व्यापक ब्रह्म स्वरूप ।