सुन्दर विलास (सन्त सुन्दरदास जी - अद्वैत वेदान्त एवं ज्ञान-भक्ति काव्य सटीक)

सुन्दर विलास (सन्त सुन्दरदास जी - अद्वैत वेदान्त एवं ज्ञान-भक्ति काव्य सटीक)
Sundar Vilas of Sant Sundardas with Hindi Commentary
सन्त सुन्दरदास जी द्वारा
DevanagariHindipublished284 पृष्ठ
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२३४ ] ॥ सुन्दर विलास ॥ कर्म न विकर्म करै भाव न अभाव धरै, शुभ हू अशुभ परै यातै निधरक है। बसती न शून्य जाकै पाप ही न पुन्य ताकै, अधिक न न्यून वाकै स्वर्ग न नरक है॥ सुख दुख सम दोऊ नीच ही न ऊच कोऊ, ऐसी विधि रहै सोऊ मिल्यौ न फरक है। एक ही न दोइ जानै बध मोक्ष भ्रम मानै, सुन्दर कहत ज्ञानी ज्ञान मै गरक है ॥२०॥ अज्ञानी कौ दुख कौ समूह जग जानियत, ज्ञानी कौ जगत सब आनन्द स्वरूप है। नैन हीन कौ तौ घर बाहिर न सूझै कछु, जहा जहा जाइ तहा तहा अधकूप है॥ जाकै चक्षु है प्रकाश अंधकार भयौ नाश, वाकौ जहा रहै तहा सूरज की धूप है। सुन्दर अज्ञानी ज्ञानी अंतरि बहुत आहि, वाकै सदा राति वाकै दिवस अनूप है ॥२१॥ (२०) निधरक-बेधटक, निर्भय । गरक-मग्न, डूबा हुआ ।