सुन्दर विलास (सन्त सुन्दरदास जी - अद्वैत वेदान्त एवं ज्ञान-भक्ति काव्य सटीक)

सुन्दर विलास (सन्त सुन्दरदास जी - अद्वैत वेदान्त एवं ज्ञान-भक्ति काव्य सटीक)
Sundar Vilas of Sant Sundardas with Hindi Commentary
सन्त सुन्दरदास जी द्वारा
DevanagariHindipublished284 पृष्ठ
पृष्ठ 246, कुल 284 में से
संदर्भ में पढ़ेंपृष्ठ 246
॥ ज्ञानी को अग ॥ [ २३७ जैसे काहू देश जाइ भाषा कहै और सी ही, समुझ न कोऊ वासी कहै का कहतु है । कोऊ दिन रहि करि बोली सीखै उनही की, फेरि समुझावै तब सबकौ लहतु है ॥ तैसे ज्ञान कहैं तै सुनत बिपरीत लागै, आप आपुनौ ही मत सबकौ गहतु है । उनही के मत करि ¸न्दर कहत ज्ञान, तबही तौ ज्ञान ठहराइ के रहतु है ॥२६॥ एक ज्ञानी कर्मनि मैं ततपर देखियत, भक्ति कौ प्रभाव नाहिं ज्ञान मैं गरक है । एक ज्ञानी भकति कौ अत्यन्त प्रभाव लिये, ज्ञान माहि निश्चै कर कर्म सौ तरक है ॥ एक ज्ञानी ज्ञानही मैं ज्ञानकौ उच्चार करै, भक्ति अरु कर्म इनि दुहु तै फरक है । कर्म भक्ति ज्ञान तीनौ वेद मै बखान कहे, सुन्दर बतायो गुरु ताहि मैं लरक है ॥२७॥ (२७) भकति-भक्ति । तरक-तर्क । लरक-तत्पर, लगा हुआ ।