सुन्दर विलास (सन्त सुन्दरदास जी - अद्वैत वेदान्त एवं ज्ञान-भक्ति काव्य सटीक)

सुन्दर विलास (सन्त सुन्दरदास जी - अद्वैत वेदान्त एवं ज्ञान-भक्ति काव्य सटीक)
Sundar Vilas of Sant Sundardas with Hindi Commentary
सन्त सुन्दरदास जी द्वारा
DevanagariHindipublished284 पृष्ठ
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२३८ ] ॥ सुन्दर विलास ॥ जसै पखी पगनि सौ चलत अवनि आड, तैसे ज्ञानी देह करि कर्मनि कग्तु है ! जैस पखी चचु करि चुगत अहार पुनि, तैसे ज्ञानी उर मै उपासना धरतु है ॥ जैसे पखी पखनि सौ उडत गगन माहि, तैसे ज्ञानी ज्ञान करि ब्रह्म मैं चरतु है । सुन्दर कहत ज्ञानी तीनौ भाति देखियत, ऐसी विधि जानै सब सशय हरतु है ॥२८॥ इन्दव छन्द एक क्रिया करि किर्षि निपावत आदि रु अंत ममत्त्व वध्यौ है । एक क्रिया करि पाक करै जब, भोजन लौ कछु अन्न रध्यौ है ॥ एक क्रिया मल त्यागत है, लघुनीति करै कहु नाहिं फध्यौ है । त्यौ यह ज्ञानि क्रिया अरु सग्रह, सुन्दर तीनि प्रकार सध्यौ है ॥ ६॥ (२८) अवनि-पृथ्वी, जमीन । अहार-आहार, भोजन । उर-हृदय, मन । (२६) किर्षि कृषि, खेती । निपावत-उपजाता है ।