भारतकोश
सुन्दर विलास (सन्त सुन्दरदास जी - अद्वैत वेदान्त एवं ज्ञान-भक्ति काव्य सटीक)

सुन्दर विलास (सन्त सुन्दरदास जी - अद्वैत वेदान्त एवं ज्ञान-भक्ति काव्य सटीक)

Sundar Vilas of Sant Sundardas with Hindi Commentary

सन्त सुन्दरदास जी द्वारा

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॥ ज्ञानी को अंग ॥ [ २३६ दोइ जने मिलि चौपरि खेलत, सारि धरै पुनि डारत पासा । जीतत है सु खुशी मन मैं अति, हारत है सु भरै जु उषासा ॥ एक जनौ दुहु ओर हो खेलत, हारि न-जीति करै जु तमासा । तैसे अज्ञानी कै द्वैत भयौ भ्रम, सुन्दर ज्ञानी कै एक प्रकासा ॥३०॥ ॥ सवईया छंद ॥ जीव नरेश अविद्या निद्रा, सुख शय्या सोयौ करि हेत । कर्म खवास पुटपरी लाई, तातै बहु बिधि भयौ अचेत ॥ भक्ति प्रधान जगायौ कर गहि, आलस भर्यौ अभाई लेत । सुन्दर अब निद्रा बस नाही, ज्ञान जागरण सदा सुचेत ॥३१॥ (३१) पुटपरी-नशीली चीजो की पुट दी हुई शराब । या पगचची ।