भारतकोश
सुन्दर विलास (सन्त सुन्दरदास जी - अद्वैत वेदान्त एवं ज्ञान-भक्ति काव्य सटीक)

सुन्दर विलास (सन्त सुन्दरदास जी - अद्वैत वेदान्त एवं ज्ञान-भक्ति काव्य सटीक)

Sundar Vilas of Sant Sundardas with Hindi Commentary

सन्त सुन्दरदास जी द्वारा

DevanagariHindipublished284 पृष्ठ

पृष्ठ 258, कुल 284 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 258

॥ अद्वैत ज्ञान को अंग ॥ [ २४६ मनहर छंद सिष्य पूछै गुरुदेव ! गुरु कहैं पूछ सिष्य, मेरैं एक संशय है ? पूछै क्यों न अब ही । तुम कह्यौ एक ब्रह्म, अबहू मैं कहू एक, एक तौ अनेक क्यौ ? इहै तौ भ्रम सब ही ॥ भ्रम इहै कौन कौ है ? भ्रम ही कौ भ्रम भयौ, भ्रम ही कौ भ्रम कैसे ? तू न जानै कब ही । कैसे करि जा गै प्रभु ? गुरु कहै निश्चै धरि, निहचै मै धार्यौ अब एक ब्रह्म तब ही ॥६॥ ब्रह्म ठौर कौ है ठौर दूसरौ न कोऊ और, बस्तु कौ बिचार कियै बस्तु पहिचानिये । पंच तत्त तीनि गुन बिस्तरे बिबिध भाति, नाम रूप जहा लगै मिथ्या माया मानिये ।: सेषनाग आदि दै कै बैकुण्ठ गोलोक पुनि, वचन बिलास सब भेद भ्रम भानिये । न तो कोऊ उरझ्यौ न सुरझ्यौ कहौ सु कौन, सुन्दर सकल यह ऊबाबाई जानिये ॥१०॥ (१०) ऊवाबाई-भूल भुलैया ।