सुन्दर विलास (सन्त सुन्दरदास जी - अद्वैत वेदान्त एवं ज्ञान-भक्ति काव्य सटीक)
Sundar Vilas of Sant Sundardas with Hindi Commentary
सन्त सुन्दरदास जी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२५० ] ॥ सुन्दर विलास ॥ प्रथम हि देह मैं तै बाहिर कौ चौकि पर्यौ, इन्द्रिय व्यौपार सुख सत्य करि जान्यौ है । कौन ऊ सजोग पाइ सद्गुरु सौ भेट भई, उन उपदेश दे कै भीतर कौं आँन्यौ है ॥ भीतर कै आवत ही बुद्धि कौ प्रकास भयौ, कौन देह ? कौन मैं ? जगत किन मान्यौ है ? सुन्दर विचारत यौ ऊपज्यौ अद्वैत ज्ञान, आप कौ अखड ब्रह्म एक पहिचान्यौ है ॥११॥ हसल छंद सकल ससार बिस्तार करि बरनियौ, स्वर्ग पाताल मृति पूरि भ्रम रह्यौ है । एक ते गिनत गिनि जाइये सौ लगें, फेरि करि एक कौ एक ही गह्यौ है ॥ यह नहि यह नहि यह नहि यह नहि, रहै अवशेष सौ बेद हू कह्यौ है । सुन्दर सही यौ बिचार आपुनपौ, आपुमै आपुकौ आपु ही लह्यौ है ॥१२॥ एक तू दोइ तू तीनि तू चारि तू पंच तू तत्व मैं जगत कोयौ । नाम अरु रूप व्है बहुत बिधि बिस्तर्यौ, तुम बिना और कोऊ नाहि बीयौ ॥