भारतकोश
सुन्दर विलास (सन्त सुन्दरदास जी - अद्वैत वेदान्त एवं ज्ञान-भक्ति काव्य सटीक)

सुन्दर विलास (सन्त सुन्दरदास जी - अद्वैत वेदान्त एवं ज्ञान-भक्ति काव्य सटीक)

Sundar Vilas of Sant Sundardas with Hindi Commentary

सन्त सुन्दरदास जी द्वारा

DevanagariHindipublished284 पृष्ठ

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पृष्ठ 260

॥ अद्वैत ज्ञान को अंग ॥ [ २५१ राव तू रक तू दाना तू दीन तू, दोइ करि मेलि तै दीयौ लियौ । सकल यह सृष्टि तुम माहि उपजै खपै, कहत सुन्दर बडौ बिपुल हीयौ ॥१३। मनहर छंद तोही मैं जगत यह तूं ही है जगत माहि, तो मैं अरु जगत मै भिन्नता कहा रही । भूमि ही तै भाजन अनेक भाति नाम रूप, भाजन बिचारि देखे ऊहै एक है मही ॥ जल तै तरग भई फेन बुद्बुदा अनेक, सोऊ तौ बिचारै एक वह जल है सही । महापुरुष जेते है सबको सिधांत एक, सुन्दर 'खल्विदं ब्रह्म' अस बेद है कही ॥१४॥ जैसे इक्षु रस की मिठाई भाति भाति भई, फेरि करि गारै इक्षु रस ही लहतु है । जैसे घृत थीजि कै डरा सौ बधि जात पुनि, फेरि पिघरे ते वह घृत ही रहतु है । (१३) बीयो-अन्य, द्वितीय, दूसरा । दाना-धनी, दानी । विपुल-विशाल । हीयो-हृदय ।