सुन्दर विलास (सन्त सुन्दरदास जी - अद्वैत वेदान्त एवं ज्ञान-भक्ति काव्य सटीक)
Sundar Vilas of Sant Sundardas with Hindi Commentary
सन्त सुन्दरदास जी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२५२ ] ।। सुन्दर विलास ।। जैसे पानी जमिकै पाखान हू सौ देखियत, सो पखान फेरि करि पानी व्है बहुत है । तैसे हि सुन्दर यह जगत है ब्रह्ममय, ब्रह्म सो जगत मय बेद यौं कहतु है ॥१५॥ जैसे काठ कौरि करि पूतरि बनाइ राखी, जो बिचार देखिये तौ उहै एक दारु है । जैसे माला सूत ही की मनिकाऊ सूत ही के, भीतरि हू पोयौ पुनि सूत ही कौ तार है ॥ जैसे एक समुद्र के जल ही कौ लौन भयौ, सोऊ तौ बिचारे पुनि उहै जल खार है । तैसे हि सुन्दर यह जगत सु ब्रह्ममय, ब्रह्म सु जगत मय याहि निरधार है ॥१६॥ जैसे एक लोहके हथ्यार नाना बिधि कीये, आदि अन्ति मधि एक लोह ई प्रवानिये । जैसे एक कंचन के भूषन अनेक भये, आदि अंत मधि एक कंचन ई जाँनिये ॥ (१५) इक्षु-ईख । थीजिकै-जमकर । पखाण-पाषाण, पत्थर । (१६) दारु-लकडी । लौन-लवण, नमक । निरधार- निश्चय ।