सुन्दर विलास (सन्त सुन्दरदास जी - अद्वैत वेदान्त एवं ज्ञान-भक्ति काव्य सटीक)
Sundar Vilas of Sant Sundardas with Hindi Commentary
सन्त सुन्दरदास जी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें॥ उपदेश चितावनी को अंग ॥ | ९७ ने रैं तौ कुपेच पर्यो गाठि अति पूरि गई, ब्रह्मा आइ छोरै पगो तौ छूटन न जबहू । तेल सौं भिजोड करि नोलग लपेटि राखै, कूकुर की पूंछ सूधी होइ नहीं तबहू ॥ मानू देत सीप बहु कीरी की भिनत जाउ, कहत कहत दिन बीत गयो सबहू । सुन्दर अज्ञान ऐसो छाड्यो नही अभिमान, निकसन प्रान लग देत्यो नहि कवहू ॥७॥ वालू माहि तेल नहि निकसत काहू विधि, पाथर न भीजै बहु वरषन घन है । पानी के मथे तं कहु घीव नहि पाइयत, कूकस कें कूटै नहि निकसत कन है ॥ शून्य कूं मूठी भरे तै हाथ न परत कछु, ऊसर के वाहै कहा उपजत अन्न है । उपदेश औषध कवन विधि लाग ताहि, सुन्दर असाध्य रोग भयौ जाकै मन है ॥८॥ (७) कुपेच-दुर्बुद्धि । छोरे-छुटावे सुलझावे । कीरीकी- कीडी के समान । (८) घन-ब दल । कूकस-भूसा । कन-कण, अन्न के दाने । शून्य-सूना आकाश । ऊसर-खारडे की जमीन ।