भारतकोश
सुन्दर विलास (सन्त सुन्दरदास जी - अद्वैत वेदान्त एवं ज्ञान-भक्ति काव्य सटीक)

सुन्दर विलास (सन्त सुन्दरदास जी - अद्वैत वेदान्त एवं ज्ञान-भक्ति काव्य सटीक)

Sundar Vilas of Sant Sundardas with Hindi Commentary

सन्त सुन्दरदास जी द्वारा

DevanagariHindipublished284 पृष्ठ

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१८ ] ॥ सुन्दर विलास ॥ बैरी घर मांहि तेरे जानत सनेही मेरे, दारा सुत वित्त तेरौ पोसि पोसि खाहिंगे । और ऊ कुटुम्ब लोग लूटैं चहू ओर ही तैं, मीठी मीठी बात कहि तोसौ लपटाहिंगे ॥ सकट परैगो जब कोऊ नहि तेरौ तब, अति ही कठिन वाकी बेर उठि जाहिंगे । सुन्दर कहत तानै झूठौ ही प्रपंच यह, सुपन की नाईं सब देखत विलाहिंगे ॥९॥ वारू कै मदिर माहि बैठि रह्यौ थिर होइ, राखत है जीवने की आसा कैऊ दिन की । पल पल छीजत घटत जात घरी घरी, बिनसत वार कहा षवरि न छिनकी ॥ करत उपाइ झूठै लेन देन षान पान, मूसा इत उत फिरै ताकि रही मिनकी । सुन्दर कहत मेरी मेरो करि भूलौ शठ, चंचल चपल माया भई किन किन की ॥१०॥ अन अन्त । (९) सनेही-प्रेमी । वित्त-धन । बाकी बेर-उनके मौक़ पर । उठि जाहिंगे-मुंह फेर लेंगे । (१०) बारू-बालू मिट्टी । छिन की-क्षणभर की । मूसा-चूहा। मिनकी-बिल्ली । शठ-दुष्ट, मूर्ख ।