भारतकोश
सुन्दर विलास (सन्त सुन्दरदास जी - अद्वैत वेदान्त एवं ज्ञान-भक्ति काव्य सटीक)

सुन्दर विलास (सन्त सुन्दरदास जी - अद्वैत वेदान्त एवं ज्ञान-भक्ति काव्य सटीक)

Sundar Vilas of Sant Sundardas with Hindi Commentary

सन्त सुन्दरदास जी द्वारा

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पृष्ठ 264

॥ अद्वैत ज्ञान को अंग ॥ [ २५५ कारज देखि भयौ बिचि विभ्रम, कारन देखि विभ्रम्म विलावै । सुंदर या निश्चै अभिन्नतरि, द्वैत गये फिरि द्वैत न आव ॥२२॥ मनहर छंद द्वैत करि देखै जब द्वैत ही दिखाई देत, एक करि देखै तब उहै एक अंग है । सूरज कौ देखै जब सूरज प्रकासि रह्यौ, किरन की देखै तौ किरन नाना रंग है ॥ भ्रम जब भयौ तब माया ऐसो नाम धर्यो, भ्रम के गये तै एक ब्रह्म सरवग है । सुंदर कहत याकी दृष्टि ही कौ फेर भयौ, ब्रह्म अरु माया कै तौ माथै नही शृङ्ग है । २३।। श्रोत्र कछु और नाहि नेत्र कछु और नाहि, नासा कछु और नाहिं रसना न और है । त्वक कछु और नाहि वाक कछु और नाहि, हाथ कछु और नाहि पावन की दौर है ॥ (२३) सरवग-सर्वव्यापक ।