सुन्दर विलास (सन्त सुन्दरदास जी - अद्वैत वेदान्त एवं ज्ञान-भक्ति काव्य सटीक)
Sundar Vilas of Sant Sundardas with Hindi Commentary
सन्त सुन्दरदास जी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२५८ ] ॥ सुन्दर विलास ॥ अनछतौ जगत अज्ञान तै प्रगट भयौ, जैसे कोऊ बालक बेताल देखि डर्यौ है । जैसे कोऊ सुपनै मैं दाव्यौ है अथारै आइ, मुख तै न आवै बोल ऐसो दुख पर्यौ है ॥ जैसे अंधियारी रैनि जेवरी न जानै ताहि, आपु ही तै साप मानि भय अति कर्यौ है । तैसे ही सुन्दर एक ज्ञान कै प्रकास बिन, आपु दुख पाइ पाइ आपु पचि मर्यौ है ॥३॥ मृत्तिका समाइ रही भाजन के रूप माहि, मृत्तिका कौ नाम मिटि भाजन ई गह्यौ है । कनक समाय त्यौ ही होइ रह्यौ आभूषण, कनक न कहै कोऊ आभूषण कह्यौ है ॥ बीज ऊ समाइ करि बृक्ष होई रह्यौ पुनि, बृक्ष ई कौ देखियत बीज नही लह्यौ है । सुन्दर कहत यह यौही करि जानौ सब, ब्रह्म ई जगत होइ ब्रह्म पूरि रह्यौ है ॥४॥ (३) अनछतो-अस्तित्वहीन । अथारै-छाती पर । (४) मृत्तिका-मिट्टी । भाजन-बर्तन । कनक-सुवर्ण, सोना ।