भारतकोश
सुन्दर विलास (सन्त सुन्दरदास जी - अद्वैत वेदान्त एवं ज्ञान-भक्ति काव्य सटीक)

सुन्दर विलास (सन्त सुन्दरदास जी - अद्वैत वेदान्त एवं ज्ञान-भक्ति काव्य सटीक)

Sundar Vilas of Sant Sundardas with Hindi Commentary

सन्त सुन्दरदास जी द्वारा

DevanagariHindipublished284 पृष्ठ

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पृष्ठ 266

॥ जगतमिथ्यात्व को अंग ॥ [ २५७ अथ जगत मिथ्यात्व को अंग ॥३३॥ मनहर छंद कियो न विचार कछु भनक परी है कान, धार आई मुनि के डरपि त्रिप खायी है । जैसे कोऊ अनछतौ ऐसै ही बुलाइयत, वार बीति गई पर कोऊ नही आगौ है ॥ वेद हु वरनि कै जगत तरु ठाटौ कियौ, अन्त पुनि वेद जर मूल तें उठायौ है । तैसे हि सुन्दर याकौं कोऊ एक पावै भेद, जगत कौ नाम मुनि जगत भुलायी है ॥१॥ ऐसी ही अज्ञान कोऊ आडकै प्रगट भयी दिव्य दृष्टि दूर गई देखे चाम दृष्टि कौ । जैसे एक आरसी सदा ई हाथ माहि रहे, साम्हैं ह्वैं न देखे फेरि फेरि देखे पृष्ठि कौ ॥ जैसे एक व्योम पुनि बादर सौ छाइ रह्यौ, व्योम नहिं देखत देखत बहु वृष्टि कौ । तैसे एक ब्रह्म ई विराजमान सुन्दर हैं, ब्रह्म कौ न देखे कोऊ देखे सब सृष्टि कौ ॥२॥ (१) अनछतो-अनुपस्थित, असत्, सत्तारहित । (२) साम्हैं-सीधी तरफ । पृष्ठि-पीछे की तरफ ।