भारतकोश
सुन्दर विलास (सन्त सुन्दरदास जी - अद्वैत वेदान्त एवं ज्ञान-भक्ति काव्य सटीक)

सुन्दर विलास (सन्त सुन्दरदास जी - अद्वैत वेदान्त एवं ज्ञान-भक्ति काव्य सटीक)

Sundar Vilas of Sant Sundardas with Hindi Commentary

सन्त सुन्दरदास जी द्वारा

DevanagariHindipublished284 पृष्ठ

पृष्ठ 269, कुल 284 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 269

२६० ] ॥ सुन्दर विलास ॥ अथ आश्चर्य को अङ्ग ॥३४॥ मनहर छन्द बेद कौ बिचार सोई सुनि कै सतनि मुख, आपु हू विचार करि सोई धारियतु है। योग की जुगति जानि जग तें उदास होइ, सुंनि मैं समाधि लाइ मन मारियतु है॥ ऐसैं ऐसैं करत करत केते दिन बीते, सुन्दर कहत अज हू बिचारियतु है। कारौ ही न पीरौ न तौ तातौ ही न सीरौ कछु, हाथ न परत तातै हाथ झारियतु है ॥१॥ मन कौ अगम अति बचन थकित होत, बुद्धि हू बिचार करि बहु खींडियतु है। श्रवन न सुनै जाहि नैन हू न देखै ताहि, रसना कौ रस सरबस छींडियतु है॥ त्वक कौ सपर्स नाहि घ्रान कौ न बिषै होइ, पगनि हू करि जित तित हींडियतु है। सुन्दर कहत अति सूक्षिम स्वरूप कछु, हाथ न परत तातै हाथ मीडियतु है ॥२॥ (१) कारो-काला। पीरो-पीला। तातो-गर्म। सीरो- ठढा। (२) खींडियतु है-बिखर जाता है। छींडियतु है-छिटक जाता है। हींडियतु है-भटकता है। मीडियतु है-मलता है।