भारतकोश
सुन्दर विलास (सन्त सुन्दरदास जी - अद्वैत वेदान्त एवं ज्ञान-भक्ति काव्य सटीक)

सुन्दर विलास (सन्त सुन्दरदास जी - अद्वैत वेदान्त एवं ज्ञान-भक्ति काव्य सटीक)

Sundar Vilas of Sant Sundardas with Hindi Commentary

सन्त सुन्दरदास जी द्वारा

DevanagariHindipublished284 पृष्ठ

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पृष्ठ 270

॥ आश्चर्य को अंग ॥ [ २६० गुफा कौ मवारि तह आसन ऊ मारि करि, प्रान हू की धारि धारि नाक सींटियतु है। इंद्रिनि कौ घोर करि मन हू कौ फेरि करि, त्रिकुटि मैं हेरि हेरि हियो छोटियतु है॥ सब छिटकाउ पुनि मुनि भ समाइ तह, समाधि लगाइ करि आंखि मीटियतु है। सुन्दर कहत हम और ऊ किये उपाइ, हाथ न परत तातै हाथ पीटियतु है॥३॥ बोलै ही न मौन धरै बैठै ही न गौन करै, जागै ही न सोवै मु तौ दूरि हो न नेरी है। आवै ही न जाइ, न तौ थिर अकुलाइ पुनि, भूखौं ही न खाइ कछु तातो ही न सीरौ है॥ लेत ही न देत कछु हेत न कुहेत पुनि, स्याम हो न श्वेत सु तौ रातौ ही न पीरौ है। दूबरी न मोटी कछु लांबी हू न छोटी तातै, सुन्दर कहै सु कहा काच ही न हीरौ है॥४॥ भूमि ही न आप न तौ तेज ही न ताप न तौ, वायु हू न ब्योम न तौ पच कौ पसारौ है। हाथ ही न पाव न तौ नैन बैन भाव न तौ रंक ही न राव न तौ बृद्ध ही न बारौ है॥ (४) गौन-गमन। नेरी-नजीक। अकुलाई-चलायमान।