भारतकोश
सुन्दर विलास (सन्त सुन्दरदास जी - अद्वैत वेदान्त एवं ज्ञान-भक्ति काव्य सटीक)

सुन्दर विलास (सन्त सुन्दरदास जी - अद्वैत वेदान्त एवं ज्ञान-भक्ति काव्य सटीक)

Sundar Vilas of Sant Sundardas with Hindi Commentary

सन्त सुन्दरदास जी द्वारा

DevanagariHindipublished284 पृष्ठ

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॥ काल चितावनी को अंग ॥ [ ३७ मेरौ देह मेरौ गेह मेरौ परिवार सब, मेरौ धन माल मै तौ बहुबिधि भारौ हौं । मेरे सब सेवक हुकम कोऊ मेटै नाहि, मेरी जुवति कौ मैं नौं अधिक पियारौ हौ ॥ मेरौ बस ऊचौ मेरे बाप दादा ऐसै भये, करत बडाई मैं तौ जगत उज्यारौ हौ । सुन्दर कहत मेरौ मेरौ कर जानै शठ, ऐसै नही जानै मैं तौ कालही कौ चारौ हू ॥१५॥ जब तै जनम धर्यो तब ही तै भूलि पर्यो, बालापन माहि भूलौ समझ्यौ न रुख मैं । जोवन भयौ है जब कामवस भयौ तब, जुवती सौ एकमेक भूल रह्यौ सुख मैं ॥ पुत्र ऊ पोउत्र भये भूलौ तब मोह वाधि, चिंता करि करि भूलौ जाने नहिं दुख मैं । सुन्दर कहत शठ तीनौ पन माहि भूलौ, भूलौ भूजो जाइ पर्यौ कालही के मुख में ॥१६॥ (१५) गेह-घर। जुवति-युवती, स्त्री, पत्नी ।