सुन्दर विलास (सन्त सुन्दरदास जी - अद्वैत वेदान्त एवं ज्ञान-भक्ति काव्य सटीक)
Sundar Vilas of Sant Sundardas with Hindi Commentary
सन्त सुन्दरदास जी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें३८ ] ॥ सुन्दर विलास ॥ ऊठत बैठत काल जागत सोवत काल, चलत फिरत काल काल वोर धर्यो है । कहत सुनत काल खातः हू पीवत काल, काल ही के गाल मांहि हर हर हस्यो है ॥ तात मात बधु काल सुत दारा गृह काल, सकल कुटंब काल काल जाल फस्यो है । सुन्दर कहत एक राम विन सब काल, काल ही कौ कृत्त कियौ अत काल ग्रस्यो है ॥१७॥ जब तै जनम लेत तब ही तै आयु घटै, माई तौ कहत मेरौ वडौ होत जात है । आज और काल्हि और दिन दिन होत और, दौर्यौ दौर्यौ फिरत खेलत अरु खात है ॥ बालापन वीत्यौ जब जोवन लग्यौ है आड, जौवन हू बीते बूढौ डोकरो दिखात है । सुन्दर कहत ऐसे देखत ही वुझि गयौ, तेल घटि गये जैसे दीपक बुझात है ॥१८॥ सव कोऊ ऐसै कहैं काल हम काटत है, काल तौ अखंड नाश सवको करतु है । (१७) कृत्त-कृत्य, काम । कुटम्ब-कुटुम्ब, परिवार । वोर-चारो तरफ ।