भारतकोश
सुन्दर विलास (सन्त सुन्दरदास जी - अद्वैत वेदान्त एवं ज्ञान-भक्ति काव्य सटीक)

सुन्दर विलास (सन्त सुन्दरदास जी - अद्वैत वेदान्त एवं ज्ञान-भक्ति काव्य सटीक)

Sundar Vilas of Sant Sundardas with Hindi Commentary

सन्त सुन्दरदास जी द्वारा

DevanagariHindipublished284 पृष्ठ

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पृष्ठ 48

॥ काल चितावनी को अंग ॥ [ ३६ जाकै भय ब्रह्मा पुनि होत है कपाइमान, जाकै भय सुर असुर इन्द्रऊ डरतु है ॥ जाकै भय शिव अरु शेषनाग तीनों लोक, केऊक कलप बीते लोमश परतु है । सुन्दर कहत नर गर्व गुमान कर. तू तौ शठ एकई पलक मै मरतु है ॥१९॥ काल सौ न बलवत कोऊ नहिं देखियत, सब कौ करत अंत काल महाजोर है । काल ही कौ डर सुन भाग्यो मूसा पैगबर, जहा जहा जाइ तहा तहां वाकौ गोर है ॥ काल ही भयानक भैभीत सब किये लोक, स्वर्ग मृत्यु पाताल मैं काल ही कौ सोर है । सुन्दर काल कोभी काल एक ब्रह्म है अखंड, बासौ काल डरै जोई चल्यौ उहि बोर है ॥२०॥ बरखा भये तें जैसे बोलत भभीरी सुर, खड न परत कहु नेकहुं न जांनिये । जेमै पूंगी वाजत अखंड सुर होत पुनि, ताहू मैं न अंतर अनेक राग गानिये ॥ (१९) कपाइमान-भयभीत । लोमश-एक प्रसिद्ध महा- दीर्घायु ऋषि । गोर-घाव, भय या कबर। सोर-शोर, हल्ला ।